तज़़मीन

रघुपति सहाय (फ़िराक़ गोरखपुरी) की शाइरी और मेरी तज़मींन

फ़िराक़ गोरखपुरी ; एक परिचय

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Ghazal & Tazmeen

प्रस्तुत है रघुपति सहाय (फ़िराक़ गोरखपुरी) की शाइरी और मेरी तज़मींन ;

रघुपति सहाय उर्फ़ फ़िराक़ गोरखपुरी पिछली सदी के उर्दू ग़ज़ल के मक़्बूल शाइर रहे हैं। ये इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के लेेेक्चरर थे। इनका जन्म 28 August 1896 में और इन्तकाल 3 March 1982 में हुआ था।

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ये उर्दू के बड़े शाइर के साथ हीं नक़्क़ाद (critic) भी थे।

इनकी शायरी में रात, अंधेरा, और जागने की फ़िक्र हमेशा  रही है ।
वैसे, ये बुनियादी तौर पर इश्क़िया शायर थे।

मिसाल के तौर पर –

“मुद्दतें गुज़रीं तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गयेे हों तुझे, ऐसा भी नहीं ।”

रघुपति सहाय (फ़िराक़ गोरखपुरी) की शाइरी और मेरी तज़मींन

फ़िराक़ गोरखपुरी कीे एक मशहूर ग़ज़ल है –

“शाम ए ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो
बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो”

इस ग़ज़ल पर मैंने एक तज़मींन लिखी थी। तज़मींन क्या है अगर यह बताते चलूँ तो
तज़़मीन” भी उर्दू शाइरी की हीं एक सिन्फ़ (विधा) है जिसमें हम किसी भी शाइर की ग़ज़ल के प्रत्येक शे’र के ऊपर अपनी त़रफ से तीन मिस्रे या कहें तीन पंक्तियाँ उसी वज़्न में लिखते  हैं।

अब उर्दू शायरी की ये विधा बहुत कम देखने को मिलती है। ग़ज़ल में अगर कोई मक़्ता हो तो हमें भी अपने लिखे मिसरे में अपना तख़ल्लुस देना जरूरी हो जाता है।

इसी तरह एक तज़़मीन बर तज़मीन भी कही जाती है जिसमें किसी तज़़मीन पर तीसरा शाइर कोई तज़़मीन कहता है ।इस त़रह इसके मिसरों की संख्या 8 हो जाती है और तज़़मीन में पांच।
आगे आने वाले किसी पोस्ट में तज़़मीन बर तज़़मीन भी यकीनन पेश करूंगा।
बहरहाल, पेश है   फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की ग़ज़ल पर मेेेरी तज़़मीन

 

उसके लब औ’ जाँफ़िजा़ आवाज़ की बातें करो
फिर उसी दमसाज़ के ऐजाज़ की बातें करो
सोगे इश्क़ आबाद है अब साज़ की बातें करो
शामे ग़म कुछ उस निगाहें नाज़ की बातें करो
बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो.”

ज़िंदगी में जाविदाँ हैं अाहो दर्दो रंजो ग़म
जिक्र से उस शोख़ के देखे गए होते ये कम
उसके ढब,उसकी हँसी,हर शौक़ उसका हर सितम
“नक्हते ज़ुल्फ़े परीशां दास्ताने शामे ग़म
सुब्ह़ होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो”.

रात भर तारीकियों में उसका चेह्रा ढूँढना
रतजगे से पलकें भारी,ख़ुद से हूँ नाआशना
देख शबनम का क़दम के जौर से यूँ फूटना
“ये सुकूते यास, ये दिल की रगों का टूटना
ख़ामुशी में कुछ शिकस्ते साज़ की बातें करो.”

मेरे शाने से लगी उसकी कभी हस्ती रहे
और आँधी सी कभी पहलू से वो उठती रहे
आह भी गाहे ब गाहे साँस में घुलती रहे
हर रगे दिल वज्द में आती रहे, दुखती रहे
यूँ हीं उसके जा ओ बेजा नाज़ की बातें करो”

दिख रहा है मुझको मंजर आर से उस पार का
आ रही बाहर से भीतर एक भूली सी सदा
आज ज़ंजीरें झनकती पैरों में हैं बारहा
कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर साह
कुछ फ़ज़ा कुछ हसरते परवाज़ की बातें करो”

___ By su’neel

उम्मीद है रघुपति सहाय (फ़िराक़ गोरखपुरी) की शाइरी और मेरी तज़मींन दोनों हीं आप सभी को पसंद आई हो।

जाँ फि़जा़ – प्राण बर्धक,
एजाज़ – चमत्कार
जाविदाँ – हमेशा
सुकूते यास – निराशापूर्ण मौन
जा ओ बेजा- उचित अनुचित
क़फ़स – कैद खााना

2 thoughts on “रघुपति सहाय (फ़िराक़ गोरखपुरी) की शाइरी और मेरी तज़मींन

  1. बहूत खूब।
    बहूत कम लोग जानते होगे फ़िराक़ साहब का असली नाम
    जानकारी देने के लिये शुक्रिया

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