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मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन

 मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन : यादों में

मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन उत्तर छायावादी युग के महत्वपूर्ण कवियों में एक सुनहरे हस्ताक्षर के समान रहे। हालावाद के प्रवर्तक, ‘मधुशाला‘ के रचयिता डॉ बच्चन की 18 जनवरी को पुण्यतिथि है।डॉ बच्चन मेरे प्रिय कवियों में से एक रहे हैं। उनकी रचनाएं जीवन दर्शन के गहरे रहस्यों को टटोलती और उसे सरलता से विश्लेषित करती प्रतीत होती हैं। इनकी रचनाएं मनुष्य के चरमराते हौसलों मैं स्थाई संबल दे कर आगे बढ़ने को प्रेरित करतीं हैं । उनकी रचनाएं प्रेम के सूक्ष्म स्फुरण को शब्द देती , सूक्ष्म भावों को समर्थ शब्द विन्यास से साकार कर देतीं है।

H R BACHCHAN
H R BACHCHAN

विलक्षण व्यक्तित्व था इनका ।गजब की जीवटता थी इनमें । जीवन की विकटताओं को अपनी जीवटता से कूट-कूटकर खंडित कर देने का करिश्मा था उनमें । मृत्यु के उस पार देखने की स्पष्ट दृष्टि थी ।
वे लंबी आयु पाये थे। लंबी आयु ने अनुभवों का धनी बनाया था उन्हें। उनकी कविता ‘इस पार उस पार’ को पढ़कर कोई भी इंसान सहज नहीं रह सकता।

कुछ भी न किया था जब उसका, उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर, जो रोरोकर हमने ढोए,
महलों के सपनों के भीतर जर्जर खँडहर का सत्य भरा!
उर में एसी हलचल भर दी, दो रात न हम सुख से सोए!
अब तो हम अपने जीवन भर उस क्रूरकठिन को कोस चुके,
उस पार नियति का मानव से व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

श्रेष्ठ आत्मकथा

मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन जिस बुलंदी पर विराजमान थे ,वह तो थे हीं ,लेकिन एक शानदार लेखक कथाकार भी थे, इसका परिचय भी उन्होंने दे दिया अपनी आत्मकथा लिख कर। अपनी आत्मकथा में इमानदारी की लगभग आख़री सीमा को छू कर उन्होंने आत्मकथा की मूल शर्त को पूरा किया। उनकी आत्मकथा चार खंडों में उपलब्ध है- क्या भूलूं क्या याद करूं ,नीड़ का निर्माण फिर ,बसेरे से दूर और दस द्वार से सोपान तक

मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन
H R BACHCHAN

 

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मैं अपनी बात करूं तो प्रथम तीन खंडों को मैं अब तक तीन- तीन बार पढ़ चुका हूं और पुनः पढ़ने की इच्छा होती रहती है । यह तीनों खंड उनके और उनके पूर्व के युग का एक आख्यान है , एक दस्तावेज है । अपनी प्रथम ज्ञात पीढ़ी ‘मनसा‘ से लेकर स्वयं तक की वंश- गाथा का वर्णन जिस शैली में उन्होंने किया, वह किसी भी व्यक्ति के हृदय में पहली बार में हीं उतर जाने का सामर्थ रखता है । इसकी विशिष्टता हीं थी की उत्तर प्रदेश सरकार ने अपना पहला ‘सरस्वती सम्मान’ इन मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा को दिया।

इस बात का मलाल मुझे होता रहा है कि जब उन्होंने अपना चौथा खंड समाप्त किया लगभग 1977 में , उसके बाद भी वह हमारे बीच करीब इतने समय रहे कि एक खंड और आ सकता था और अपने लाजवाब और उपयोगी अनुभवों से हमें लाभान्वित कर सकते थे, परंतु शायद शारीरिक अस्वस्थता या किसी अन्य कारण ने ऐसा ना होने दिया होगा। कभी-कभी ख़्याल आता है, यदि मधुबाला, मधु कलश और मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन कवि न  होकर कहानीकार या उपन्यासकार होते तो क्या होता! निश्चित तौर पर, वे तब भी साहित्य के शिखर को सुशोभित कर रहे होते।
इनकी दस्तावेजी आत्मकथा और उसकी शैली ने मुझे यह एहसास दिलाया कि हर व्यक्ति, चाहे वह लेखक हो या ना हो, अपनी वंश-गाथा जब तक उसे ज्ञात हो लिखनी चाहिए । बाज़ार के लिए नहीं, कम से कम अपने परिवार और अगली पीढ़ियों के लिए। यह उनकी अगली आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना उपयोगी हो सकता है इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। आने वाली पीढ़ियां आप की कितनी ऋणी होगीं यह सोच सकते हैं ।

मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन
मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन

इनकी रचनाओं को पढ़ते हुए और आत्मकथाओं के दुबारा तिबारा अध्ययन के बाद मेरे मन में उनसे मिलने की प्रबल इच्छा हुई थी, मगर ऐसा होना शायद नहीं था।
सन 2000 में मेरा इलाहाबाद जाना हुआ। वहां मेरे भाई मुट्ठीगंज इलाक़े में रह कर पढ़ाई कर रहे थे। तब तक डॉक्टर बच्चन की आत्मकथा के माध्यम से मैं उनके बारे में काफी कुछ जान चुका था। मैंने अपने भाई से उनके मुट्ठीगंज में ही घर होने की बात कही और उनका घर देखने की इच्छा जताई। इनके साथ रहने वाले एक दोस्त ने शाम को उनका घर दिखाने का वादा किया। बहरहाल उन्होंने वादा पूरा किया। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि बस कुछ फर्लांग की दूरी पर हीं उनका घर था जिसमें एक प्राइमरी स्कूल तेजी बच्चन जी के नाम से चलता था और शाम में स्थानीय लोगों के द्वारा कोचिंग क्लासेज चलाए जा रहे थे । बड़ी हसरत से मैं अंदर गया। एक दो कमरे में कुछ स्टूडेंट्स पढ़ रहे थे। एक कमरा कोने में खाली था, दो एक कमरे शायद स्थाई तौर पर बंद थे।। बीच में आंगन था । ऊपरी मंजिल पर एक परिवार रह रहा था जो बताया गया कि डॉक्टर बच्चन के ही रिश्तेदार हैं।
बहरहाल , उसी परिवार का एक बच्चा जिसकी उम्र करीब 12-13 वर्ष रही होगी, मेरी जिज्ञासाओं को समझते हुए उसने मुझे उस कोने वाले कमरे में ले जाकर बताया कि इसी में डॉक्टर बच्चन ‘मधुशाला‘ लिखे थे । खै़र, तब मैं काफी देर तक वहां रुक कर दीवारें ज़मीन और कमरे के ताक को देखता रहा और उस दौर को ख़ामुशी से महसूस करने की कोशिश की जिसमें बच्चन अपने जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव के साथ वक़्त गुजार रहे थे। कालजयी रचना मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन को कल्पनाओं में आँगन, बरामदे और कमरों में टहलता घूमता महसूस करता रहा। ऐसा असर उनकी कविताओं से अधिक आत्मकथाओं की कथा शैली , प्रसंग के साक्षात जीवंत चित्रांकन के कारण ही हुआ था।
डॉ बच्चन का काव्य संसार अद्भुत था। संवेदनाओं का शब्दों के साथ गजब का तारतम्य देखने को मिलता है। जीवन-दर्शन, करूणा और प्रेम के कवि डॉ हरिवंश राय बच्चन। प्रेम को कहां-कहां से इन्होंने छुआ और प्रेम ने इनको कैसे-कैसे गढ़़ा, यह उनकी ‘मिलन यामिनी’ ‘निशा निमंत्रण’ ‘एकांत संगीत‘ जैसे काव्य संग्रह को पढ़कर आभास होता है।

रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्‍व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो;
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो। (मिलन यामिनी)

इंद्र धनुष की आभा सुंदर
साथ खड़े हो इसी जगह पर
थी देखी उसने औ’ मैंने–सोच इसे अब आँखें गीली!
यह पावस की सांझ रंगीली! (निशा निमंत्रण)

मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन
हरिवंश राय बच्चन

जलता है कोई दीप नहीं,
कोई भी आज समीप नहीं,
लेटा हूँ कमरे के अंदर बिस्तर पर अपना मन मारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे! (एकांत संगीत)

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

‘अग्निपथ’ किसी भी व्यक्ति के टूटते हौसलों को पुनः संगठित करने का पूर्ण सामर्थ रखता है।

वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े
एक पत्र छांह भी मांग मत…मांग मत… मांग मत

मिलन यामिनी’ ‘निशा निमंत्रण’ एक ऐसा काव्य-संसार गढ़ता है कि व्यक्ति वर्तमान से निकल शब्दों को थाम उसी दुनिया की दीवारें गलियाँ और जनमानस के बीच जा बैठता है।

डॉ बच्चन 45 वर्ष की उम्र में लंदन गए थे कैंब्रिज से पीएचडी करने । 27 नवंबर 1907 को प्रयाग में जन्मे डॉ बच्चन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के लेक्चरर रहे , भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के तौर पर रहे , राज्य सभा सदस्य रहे, । पद्म भूषण (1976) से उन्हें नवाजा गया । कई साहित्यिक पुरस्कारों ने अपनी शोभा बढ़ाई।

मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन
मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन

मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन का निधन 18 जनवरी 2003 को हुआ। साहित्य जगत इस ख़बर से सन्न रह गया। आम जनमानस के लिए भी ये शोक का विषय बना। जाहिर सी बात थी, मैं भी अत्यंत दुखी था। अगले ही दिन दो रचनाएं मैंने की।
डा बच्चन की ‘मधुशाला’ के शब्दावलियों का इस्तेमाल कर तब मैंने जो दो रचनाएँ की उनमें से एक प्रस्तुत है-

कैसी ये हाला पी तूने किस मधुशाले का था साकी!

मदिरा की बातें कर कर के मस्त हुए अबकी ऐसे तुम
जग की सुध रही और ना ही रही स्वयं की हुए कहां गुम
हाला प्याला औ मतवाला द्वार दरीचों औ दीवारें
शोकग्रस्त है अब मधुशाला देख जमीं पर पड़ी दरारें

पड़ा है क्यों निस्तब्ध यूं तू अभी उठा हाला है बाकी

हक्का-बक्का सब मौन खड़े हैं देख पुराने मतवाले को
तुझे देख सुनकर छा जाती मदहोशी कैसे कैसों को
बता मुझे क्या बात हुई क्या रास नहीं मदिरा आई
या मधुबाला की आंखों में तुमने वो धार नहीं पाई

मुंह फेर लिए ऐसे जैसे लत छूट गई तुम्हे सुरा की

देख हलाहल हो जाएगी कहीं ये जा कर सुर्ख़ हाला
निज अधरों की लाली की अब कसम दे रही है मधुबाला
उचित नहीं ये यदि आंसू की बूंद गिरी उसके नैनों से
उऋण नहीं हो सकता तू मधुबाला के उन रैनों से

अलक देख है बिखर गई अब तुझ बिन कैसे मधुबाला की

था सच्चा प्रेषक तू तूने मधुशाले का पथ दिखलाया
सच बोलूं मधुशाले में जो प्याला निज कर में था आया
जीवन पथ पर तब नाड़ी में दौड़ी उर्जा उर्मिल बनकर
जाना अश्रु स्वेद रक्त से मानव जाता एक रोज निखर 

सोज़ सुरा सुर का तेरा वो जीवन था अद्भुत हीं झांकी

ऐसे विद्वान,  महान कालजयी साहित्य रचने वाले और मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन  को शत् शत् नमन

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