तज़़मीन

तज़़मीन बर ग़ज़ल जाँ निसार अख़्तर

 जाँ निसार अख़्तर

दोस्तो,  एक बार फिर पेश है तज़़मीन बर ग़ज़ल जाँ निसार अख़्तर ।

जां निसार अख़्तर एक ऐसे शाइर रहे हैं जिनकी कई पीढ़ियां शाइरी को ओढ़ती-बिछाती रहीं। एक लंबी फेहरिस्त रही है शाइरों की। जां निसार अख़्तर के बेटे जावेद अख़्तर और सलमान अख़्तर भी, तो पिता मुज़्तर खैराबादी भी एक मकबूल शाइर थे। वही मुज़्तर खैराबादी के पिता मौलाना फजले हक़ खैराबादी भी अपने जमाने के विद्वान शाइर थे । इनके साथ एक ख़ास बात यह जुड़ी हुई है कि मिर्जा ग़ालिब के कहने पर इन्होंने उनके दीवान को संकलित किया था ।

एक मशहूर शे’र है ‘
किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्‍त-ए-गुब़ार हूँ

Jaan nisar akhtar
Jaan nisar akhtar(गूगल साभार)

पहले यह माना जाता रहा था कि यह शे’र बहादुर शाह जफ़र का है, लेकिन बाद में कुछ दस्ताबेजों से पता चला कि यह शे’र मुज़्तर खैराबादी का है ।
बहरहाल
जाँ निसार अख़्तर 18 Feb 1914 को ग्वालियर में पैदा हुए।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय से MA करने के बाद ये हमिदिया काॅलेज, भोपाल में उर्दू के प्रोफेसर भी रहे।
बाद मे ये फ़िल्मों में गीतकार की हैसियत से भी काम किये  जहां इन्होनें कई शानदार गीत दिये। एक फ़िल्म ‘बहु बेग़म’ (1976) का निर्माण भी इन्होनें किया।

तज़़मीन बर ग़ज़ल जाँ निसार अख़्तर

बहुत अरसा हुआ रेडियो पर मैंने एक ग़ज़ल सुनी थी ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था ।बहुत ही सुंदर ग़ज़ल थी और इस ग़ज़ल को  गा रहे थे मुकेश साहब। ज़ह्न में कहीं ये ग़ज़ल बैठ गई थी लेकिन शाइर का नाम पता न था तब। बहुत बाद में चलकर पता चला कि इस ग़ज़ल के शाइर जाँ निसार अख़्तर साहब थे ।

अचानक एक दिन यह ग़ज़ल मैंने उनकी एक किताब जाँ निसार अख़्तर: एक जवान मौत में पढ़ी और तभी इसपर एक तज़़मीन  लिखने का इरादा हुआ। और सच तो ये है कि मेरी पहली तज़़मीन थी ये, जो मैंने जाँ निसार अख़्तर साहब की ग़ज़ल पर लिखी जिसे कभी बरसों पहले रेडियो पर मुकेश जी की आवाज़ में सुनी थी

तज़़मीन बर ग़ज़ल जाँ निसार अख़्तर
Jaan nisar akhtar(गूगल साभार)

जैसा कि आप सब को पता होगा , इसमें किसी शाइर की ग़ज़ल के हर शे’र के उपर तीन मिसरे लगाये जाते हैं उसी बह्र (वज़्न) में। काफ़िये का चयन प्रस्तुत शे’र के आधार पर किया जाता है। तो पेश है-

 

तज़़मीन बर ग़ज़ल जाँ निसार अख़्तर

 

वो होंगे कैसे, सितम जिनपे मैने ढाया था
कि मैं रुका न मुझे कोई रोक पाया था
थे अपने लोग मगर उनसे यूँ निभाया था
“ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था ”

जमूद हूँ कि रवाँ हूँ मैं रहगुज़र की तरह
रुका कभी तो लगा वो भी इक सफ़र की तरह
दयारे गै़र में उभरा कुछ उस दहर की तरह
गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था ”

वो दिल फ़रेब मेरे ख़्वाब आज भी मुझको
हैं याद और बुझी आँखें वो गली मुझको
तेरे बगै़र जी लेंगे ये आस थी मुझको
मुआफ़ कर न सकी मेरी ज़िन्दगी मुझ को
वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था

मैं जी रहा था ग़मे आप में यहां कैसे!
फ़ुसूँ तेरा कि मैं आख़िर निकल गया ग़ै से
खुदा ने ख़ूब दी इश्वागरी तुम्हें वैसे
शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे
कुछ इस कमाल से तूने बदन चुराया था ”

उदास आज फ़लक पे सितारे हैं सह़री
किसी की आह ख़ुनुक इस हवा में फिर उभरी
कि थी ये बात जो ये रात ख़ूब थी गहरी
पता नहीं कि मेरे बाद उन पे क्या गुज़री
मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था ”

मुझे उम्मीद है ये तज़़मीन बर ग़ज़ल जाँ निसार अख़्तर अच्छी लगी हो।

 

___by su’neel

ग़ै–  निराशा,

इश्वगरी– स्त्रियों का हाव भाव,

जमूद– गतिहीनता

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